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अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी

हमारा पड़ोसी देश अफ़गिस्तान सदियों से स्थिर रहा है । फिर 1989 में अमेरिका तथा  USSR (Union of Soviet Socialist Republics) के बीच जारी शीत युद्ध के कारण ही अमेरिका द्वारा बनाई गई तालिबान संगठन ने तो 1991 मे पूर्व सोवियत संघ को 15 देशों में विभाजित कर दिया। उसके बाद ये तालीबान संगठन ने अफ़गिस्तान में 5 सालो तक अपने तौर तरीके से शासन किया। फिर देखते ही देखते ये संगठन तालिबान (अफ़गिस्तान के विद्यार्थी संगठन) आतंकवादी संगठन बन गया। तालीबान समर्थित अलकायदा के आतंकी ओसामा बिन लादेन द्वारा 2001 में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर होने वाली प्लेन अटैक के बाद अमेरिका ने तालिबान और अलकायदा के खिलाफ  जंग कि शुरुआत कर दी। अलकायदा तो पंगु हो चुका है लेकिन तालिबान के खिलाफ कुछ खास उपलब्धि नहीं हासिल कर पाया।

अफगानिस्तान में अमेरिका 20  साल से लड़ रहा है। उसने फौजी अभियान पर लगभग  150 लाख करोड़ रुपए से अधिक खर्च किए हैं। उसके  2500 से अधिक  सैनिक मारे गए। हजारों अफगानियों को जान गंवानी पड़ी है। अमेरिका पर आम नागरिकों को भी मारने के  भी आरोप लगते रहे है। इतने लंबे अरसे के बाद भी अमेरिका   को कुछ खास उपलब्धि हासिल नहीं हो पाया
तालिबान के खौफनाक लड़ाकों की वापसी हो रही है। जिनमे थोड़ी भी इंसानियत नहीं बसी है।  उन्होंने लगभग 85% क्षेत्र पर कब्जा कर लिया  है, उनके सामने अफगान सैनिक हथियार डाल दे रहे हैं या देश छोड़ भाग जा रहे है। और वहा के बुजुर्ग लोग तो तालिबान औरअफगान सैनिक के बिच समझौता करा के उन्हे लड़ने से रोक दे रहे है। खुफिया एजेंसी के अनुसार तो लड़ाके एक महीने में काबुल पर कब्ज़ा कर लेगे। 
                    इस बीच सभी देश अपने अपने राजनीति हित साधने में लग गए है। भारत भी अमरीका के साथ साथ तालिबान के साथ बातचीत शुरू कर दी है। भारत नही चाहता है की उसके द्वारा लगाए गए अफगिस्तान में लाखो करोड़ों डालर यूही ही बर्बाद हो जाए तथा भारत अपनी मौजूदगी मध्य एशिया में कायम रखना चाहता है ताकि वो पाकिस्तान पर कुछ हद तक पकड़ बनाए सके और तालिबान भी भारत से समर्थन चाहने का काफी इच्छुक हैं। क्योंकि तालिबान जानता है की बिना भारत के समर्थन के उसके विदेशी हित कभी सफल नहीं होगे।
अमेरिका द्वारा खाली की जमीन पर रूस, भारत , चाइना, पकिस्तान उस जगह को सैन्य अड्डे के लिए यूज  करना  चाहेंगे।। यदि ये सभी देश वहा के चुनी सरकार के साथ आते हैं तो वहा बहुत ज्यादा खून खराबा होगा। तालिबान लगातार अफगान क्षेत्र पर कब्ज़ा जमा रहा है दूसरी ओर अफगानी राष्ट्रपति अशरफ गनी प्राइवेट सैनिकों को एकजुट करने में लगे हैं  लेकिन बहुत से देश जो पहले वहा की चुनी हुई सरकार के समर्थन में थी। अब वो अपना समर्थन खींच चुकी हैं।

भारत के विदेश मंत्री जयशंकर ने पहले कतर के दोहा मे अब रूस में तालिबान से बात कर के जाहिर कर चुका है की भारत अपना पलड़ा बदल चुका है।
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