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सम्पूर्ण पाचन तंत्र ( digestive system)

पाचन तंत्र (Digestive System)

➡️ वैसे अंग को भोजन पचाने में सहायता करते हैं। उन्हें सामूहिक रूप से पाचन तंत्र कहते हैं। जिसमें जटिल भोजन सरल पदार्थों में टूट जाता है।
 



➡️ पाचन तंत्र दो भागों में बँटा होता है।

    1. आहारनाल

     2. सम्बद्ध (जुड़ी) पाचक ग्रंथि

आहारनाल (Elementary Canal)

यह मुख गुहा से प्रारंभ होकर गुदा तक रहता है। पाचन के समय भोजन आहारनाल में ही रहता है। आहारनाल की लम्बाई लगभग 32 फीट होती है। आहारनाल के अंतर्गत मुख गुहा, ग्रासनली, अमाशय, छोटी आंत, बड़ी आंत, मलाशय तथा गुदा आते है।

सम्बद्ध पाचन ग्रंथि (Digestive Gland)
ये ग्रंथियों भोजन को पचाने वाली इंजाइम का निर्माण करती है। इसे अंतर्गत लार ग्रंथि, यकृत, पिताशय तथा अग्नाशय आते हैं।

➡️ पाचन की क्रिया मुख गुहा से प्रारंभ होती है। पाचन की क्रिया छोटी आंत में पूर्ण हो जाती है। बड़ी आंत में जल का अवशोषण होता है।

मुख गुहा (Baccul Carity)
पाचन मुख गुहा से प्रारंभ होता है। मुख गुहा एक खाली जगह होता है जिसमें एक जीभ, तीन जोड़ा लार ग्रंथि तथा 32 दांत पाये पाये जाते हैं।

लार ग्रंथि (Salivary Gland)
लार ग्रंथि से प्रतिदिन एक से डेढ़ लीटर (1.2L) लार का स्त्राव निर्माण होता है।
➡️ लार ग्रंथि से लाइसोजाइम, टायलीन, डाइस्टेज तथा           म्यूलीन नामक इंजाइम निकलते हैं। इसमें सर्वाधिक            मात्रा में टायलीन निकलता है।

➡️ लाइसोजाइम इंजाइम कीटाणुओं को मार देता है। टायलीन तथा डाइस्टेज इंजाइम स्टार्च (मण्ड) को शर्करा (कार्बोहाइड्रेट) में बदल देते हैं।
Remarks: आज के बाहरी भाग में स्टार्च (आमतौर पर चोकर कहते हैं ) पाया जाता हैं।
➡️ म्यूलीन इंजाइम भोजन को चिपचिपा ( लसलस) बना देता है। जिससे उसे निगलने में आसानी होती है।

➡️ लार ग्रंथि तीन जोड़ी होती है जिसमें सबसे बड़ी लार ग्रंथि पैरोटिड होती है [ पैरोटिड > Sub Mandibular > Sub Lingual ) जब पैरोटिड ग्रंथि लार ग्रंथि विषाणु द्वारा संक्रमित हो जाती है तो उसमें सूजन आ जाता है जिसे ग्लसुआ (Mums) कहते हैं। Remark- साँप में पैरोटिड ग्रंथि प्वाजन ग्लैण्ड (जहर की थैली) का कार्य करती है।

दाँत (Teeth)

दाँतों का अध्ययन Odontology कहलाता है। दाँत में कैल्शियम सर्वाधिक मात्रा में पाया जाता है। 
➡️ दाँतों के निर्माण में 85% योगदान कैल्शियम फॉस्फेट का होता है। 10% योगदान CaCO, होता है शेष भाग कैल्शियम क्लोराइड होता है दाँतों का क्षरण (टूट-फूट) फ्लोरीन के कारण होता है। जिसे cavity (खोडिला) कहते हैं । 
➡️ मानव दाँत के दो परत (Layer) होता है। बाहरी परत इनामेल कहलाता है जबकि आंतरिक भाग डेन्टाइन कहलाता है।
➡️  मानव शरीर का सबसे कठोर भाग दाँत का इनामेल होता है जो कैल्शियम फॉस्फेट का बना होता है। इनामेल दाँतों की रक्षा करता है।
DIPHYODONT
वैसे दाँत जो जीवन में दो बार आते हैं उन्हें Diphyodont कहते हैं। जैसे दूध के दाँत जिनकी संख्या 20 होती है।

 MONOPHYODONT
वैसे दाँत जो जीवन में केवल एक ही बार निकलता है Monophyodont कहलाते हैं। जैसे- अकल दाँत । 
मानव के दाँत चार प्रकार के होते हैं

1. Incisor (I)

2. Canine (C)

3. Pre Molar (Pm)

4. Molar (M))

1. Incisor (कृतक)
इसे Nose teeth भी कहते हैं यह भोजन को काटने के काम में आता है। मानव में इसकी संख्या 4+4 8 है। शाकहारी जानवरों में Incisor चौड़ा होता है।

2. Canine (रदनक)
इसे Eye teeth भी कहते हैं। यह भोजन को चीरने-फारने का कार्य करता है। मानव में इसकी संख्या 2+2=4 है। मांसाहारी जानवरों में Canine अधिक नुकीला होता है। और बड़ा होता है।

3. Pre-Molar (अग्र-चवर्णक)
इसे cheek teeth भी कहते हैं। यह भोजन को चबाने का कार्य करता है। बच्चों में यह बिल्कुल भी नहीं पाया जाता है। वयस्क में इसकी संख्या 4 +4= 8 होती है।

4. Molar (चवर्णक)
इसका भी कार्य भोजन को चबाना है। बच्चों में अंतिम Molar (III Molar) नहीं पाया जाता है। वयस्क में इसकी संख्या 6 +6=12 होती है अर्थात् चारों प्रकार में सर्वाधिक संख्या में Molar पाया जाता हैं
 Remark:- बच्चों में Pre Molar का पूर्णतः अभव होता है तथा अंतिम Molar नहीं पाया जाता है। है।

➡️ बच्चों में कुल 20 दाँत टूटने के बाद दोबारा निकलते हैं। इस 20 दाँतों को दूध के दाँत कहते हैं। दूध के दाँत 12 वर्ष की अवस्था तक पूर्णतः टूट चुके होते हैं और दोबारा नये दाँत निकलना प्रारंभ हो जाते हैं इस प्रकार मानव जीवन में दाँतों की कुल संख्या 20 + 32 = 52 होती है। 

➡️ पक्षियों के चोच दाँत का ही रूपांतरित रूप होता है।

➡️ हाथी का बाहर निकला दाँत उसके ऊपरी जबड़े का का 2nd Incisor होता है।

  Dental formula =  I C Pm M 
                                 I C Pm M
                         

➡️ दंत सूत्र द्वारा दाँतों का » भाग ही दिखाया जाता है। जानवरों में ऊपरी जवड़ा में दाँत नहीं होते हैं। 

➡️ स्तनधारी में सर्वाधिक दाँत सुअर तथा घोड़ा का होता है - 44

➡️ मच्छर में 47 दाँत होते हैं। जबकि गाय, भेड़ में 32 होते हैं।

ग्रासनली (Oesophagus):- यह मुखगुहा को अमाशय से जोड़ने का कार्य करता है। यह नली के समान होता है। इसमें कोई भी पाचन की क्रिया नहीं होती है।

अमाशय (पेट) (Stomach) - यह थैलीनुमा आकृति होती है जो भोजन को संग्रहित करने तथा पचाने दोनों का कार्य करती है। यह भोजन को लगभग 4 घंटे रोककर रखती है।

अमाशय का तीन भाग होता है- कार्डिएक ,फण्डिक तथा पाइलोरिक

➡️ कार्डिएक से HCI निकलता है जो टायलिन के प्रभाव को समाप्त करता है और कीटाणुओं को मार देता हैं यह भोजन को अम्लीय बना देता है और इंजाइम की क्रियाशक्ति को बढ़ा देता है।

➡️ फण्डिक बीच का भाग होता है जिसमें काटेनुमा रचना पायी जाती है जिसे रुजी कहते हैं। यह भोजन को रोककर रखने का कार्य करता है जब हम भोजन नहीं किये रहे है तो रुजी अपने स्थान पर खड़ा हो जाता है और चुभन होने लगती है।

➡️ पाइलोरिक में जठर ग्रंथि पायी जाती है जिससे जठर रस (Gastric Juice) निकलता है। जब जठर ग्रंथि काम नहीं करती है तो उस रोग को Gastric कहते हैं। जठर रस में रेनिन तथा पेप्सीन पाया जाता है।

,➡️ रेनिन दूध को दही में बदल देता है अर्थात् दूध को पचाता है यह दूध में उपस्थित केसीन प्रोटीन को कैल्शियम पारा कैसीनेट में में बदल देता है।

➡️ पेप्सीन प्रोटीन को पचाता है। यह प्रोटीन के पेप्टोन में बदल देता है भोजन अमाशय के बाद छोटी आंत में जाता है। भोजन अब काईम का रूप ले चुका होता है।

छोटी आंत (Small Intenstine)
भोजन का पूर्ण पाचन छोटी आंत में होती है। छोटी आंत के तीन भाग होती है।
1. पक्वाशय (Duodenm)

2. जेजुनम (Jejunum)

3. इलियम (Ileum)

यकृत (Liver)
यह सबसे बड़ी ग्रंथि है। इसका भार लगभग 1.5 kg होती है। यह अपने क्षतिग्रस्त हिस्सों पुर्ननिर्माण स्वयं कर लेती है। यकृत में पीत्त (bile) का निर्माण होता है। ने विशेषज्ञ)

पित्ताशय (Gallbladder)

इसमें यकृत द्वारा बनाया गया पित्त आकर जमा रहता है। इसमें पित्त का निर्माण नहीं होता है। पित्ताशय यकृत के ठीक नीचे रहता है। पित्ताशय में जब Stone का निर्माण हो जाता है तो ठीक नहीं हो सकता है। इसलिए पूरे पित्ताशय को काटकर निकाल दिया जाता है।
➡️ पित्त इंजाइम न होते हुए भी पाचन में सहायक है। पित्त भोजन को क्षारीय बना देता है क्योंकि पित्त क्षारीय होता है। पित्त का pH मान 7.8 – 8.5 तक होता है। यह पित्त भोजन (काईम) में उपस्थित वसा (Fat) को तोड़ देता है। जिस क्रिया को पायशीकरण (Emalsification) कहते हैं।


पक्वाशप या ग्रहणी (Duodenum) 
यह छोटी आंत का पहला भाग होता है। अमशय के बाद भोजन (काईम) ग्रहणी में आता है जहाँ उसमें पित्त मिलती है वह क्षारीय बन जाता है। ग्रहणी में किसी भी प्रकार का इंजाइम नहीं होता है। बल्कि इसमें दो प्रकार के हार्मोन पाये जाते हैं।

1. कोलेसिस्टो काईनीन

2. सिकेटीन

कोलेसिस्टो काइनीन
यह पित्ताशय के पित्त निकालने या स्त्रावित करने के लिए उत्तेजित करता है ताकि भोजन क्षारीय हो सके।
सिकेटीन
यह अग्नाशय को अग्नाशयी रस (Pancreatic Juice) को स्त्रावित करने के लिए उत्तेजित करता है ताकि भोजन सरलता से पच सके।
Remark:- अग्नाशय से तीन प्रकार के इंजाइम निकलते हैं। इन तीन को सामूहिक रूप से पूर्ण पाचक रस कहते हैं क्योंकि यह भोजन के सभी अवयव को पचा सकते हैं।

1.  ट्रिप्सीन:- यह प्रोटीन (पेप्टोन) को पचाकर पेप्टाइड में बदल देता है।
2. एमाइलेज:- यह स्टार्च (मण्ड) को शर्करा में तोड़ देता है।

3. लाइपेज:- यह पित्त द्वारा पायसीकृत (Emalsified) वसा को तोड़कर ग्लिसरोल तथा वसीय अम्ल (Fatric acid) में बदल देता है।

Trick- अग्नाशय में इंजाइम (पूर्ण पाचन रस)

LAT

L= लाइवेज.  A = एमाइलेज     T= ट्रिप्सीन


•जेजुनम में पाचन की कोई क्रिया नहीं होती है ग्रहनी और बाद भोजन जेजुनम में जाता है और जेजुनम के बाद इलियम में जाता है। 

इलियम
यह छोटी आंत का अंतिम भाग होता है। यहाँ से भोजन का पाचन तथा अवशोषण दोनों होता है। यहाँ से कई प्रकार के आंत रस (Instestinal Juice) निकलता है। इन सभी आँत रस को सक्कस इन्ट्रीकस (Saccus Intericus) कहते हैं।

➡️ निम्नलिखित इंजाम पाये जाते हैं

1. इरेप्सीन:- यह प्रोटीन के पचाता है। यह प्रोटीन (पेप्टाइड) को Amino अम्ल में बदल देता है और यहाँ प्रोटीन का पाचन पूर्ण हो जाता है।

Protein➡️पेप्टोन  ➡️     पेप्टाइड    ➡️Amino Acid
 (भोजन)    (अमाशय)   (Deudenum)    (llium)

2. लाइपेज:- यह वसा का पाचन करता है और वसा को ग्लिसरॉल तथा वसीय अम्ल (Fatry Acid) में बदल देता है। 
लाइपेज  ➡️  वसा  ➡️  ग्लिसरॉल   ➕  वसीय अम्ल

3. माल्टेज:- यह माल्टोज को पचाता है।

4.सुक्रेज:- यह शुक्रोज (चीनी) को पचाता है।

5. लैक्टेज:- यह लैक्टोज को पचाता है।

NOTE:- छोटी आँत का अंतिम भाग इलियम में अंगुली जैसी रचना पायी जाती है जिसे विलाई (Villi) कहते हैं। विलाई अवशोषण (चूषणे) करने का कार्य करता है।

➡️ भोजन के तुरन्त बाद अधिक जल नहीं पीना चाहिए क्योंकि यह इंजाइम को पतला कर देता जिससे पाचन नहीं हो पाता है।
➡️ भोजन करने के कुछ समय बाद हमें नींद आने लगती है क्योंकि भोजन पचाने के लिए शरीर का अधिकांश रक्त अमाशय के मांसपेशियों में चला जाता है और मस्तिष्क में रक्त की कमी हो जाती है। जिस कारण नींद आने लगता है।

➡️ छोटी आंत (इलियम) से भोजन निकलता है तो वह काइल का रूप ले लेता है और बड़ी आंत में प्रवेश कर जाता है।

बड़ी आंत (Large Intestine)
बड़ी आंत में भोजन का पाचन नहीं होता है इसमें केवल जल अवशोषण होता है भोजन का नहीं। इसमें विटामिन B का भी निर्माण होता है।
1. सीकम
2. कोलोन
3. रेक्टम या मलाशय

छोटी आंत के बाद भोजन सीकम में प्रवेश करता है। सीकम पेट में दाहिने ओर होता है जिसके नीचे एपेन्डिक्स पाया जाता है। Apendics हमारे शरीर में एक अवशेषी अंग हैं यह सेल्युलीज को पचाता है। यह जानवरों का एक मुख्य अंग है।
 NOTE:- छोटी आँत का अंतिम भाग इलियम में अंगुली जैसी रचना पायी जाती है जिसे विलाई (Villi) कहते हैं। विलाई अवशोषण (चूषणे) करने का कार्य करता है।

भोजन के तुरन्त बाद अधिक जल नहीं पीना चाहिए क्योंकि यह इंजाइम को पतला कर देता जिससे पाचन नहीं हो पाता है। भोजन करने के कुछ समय बाद हमें नींद आने लगती है क्योंकि भोजन पचाने के लिए शरीर का अधिकांश रक्त अमाशय के मांसपेशियों में चला जाता है और मस्तिष्क में रक्त की कमी हो जाती है। जिस कारण नींद आने लगता है।

छोटी आंत (इलियम) से भोजन निकलता है तो वह काइल का रूप ले लेता है और बड़ी आंत में प्रवेश कर जाता है।

बड़ी आंत (Large Intestine)

बड़ी आंत में भोजन का पाचन नहीं होता है इसमें केवल जल अवशोषण होता है भोजन का नहीं। इसमें विटामिन B का भी निर्माण होता है।
1. सीकम
2. कोलोन
3. रेक्टम या मलाशय

छोटी आंत के बाद भोजन सीकम में प्रवेश करता है। सीकम पेट में दाहिने ओर होता है जिसके नीचे एपेन्डिक्स पाया जाता है। Apendics हमारे शरीर में एक अवशेषी अंग हैं यह सेल्युलीज को पचाता है। यह जानवरों का एक मुख्य अंग है।

 Remark:- वैसे अंग को अवशेषी अंग (Vestiage) कहते हैं जो शरीर में तो होता है किन्तु काम नहीं करता है। जैसे Apendics, Third Molar, Premolar, Pinna, कर्ण पल्ल,  त्वचा के बाल etc.

जब कभी भोजन Apendics में फंस जाता है तो उसे ऑपेरशन करके Apendics पूरा काट दिया जाता है। सीकम के बाद कोलोन प्रारंभ होता है। जिसमें जल का अवशोषण होता है। कालोने में ही म्यूकस का निर्माण होता है। जो पचे भोजन को चिपचिपा बना देता है। म्यूकस का निर्माण मलाशय (Rectum) में अवशिष्ट पदार्थ जमा रहता है और गुदा के द्वारा बाहर निकल जाता है।
➡️ पाचन की क्रिया एक जल अपघटन की क्रिया है। पाचन की सम्पूर्ण क्रिया पाँच अवस्थाओं में होती है।
1. अंतग्रहण (Injuection) :- भोजन को निगलने की क्रिया को अंत: ग्रहण कहते हैं।

2.पाचन (Digestion):- भोज्य पदार्थों का छोटे-छोटे सरल पदार्थों में टूटना पाचन कहलाता है।

3.अवशोषण (Absortion) :- पचे भोजन पदार्थों को कोशिकाएँ जब सोख लेती है तो उसे अवशोषण कहते हैं।

4. स्वांगीकरण (Assimilation) :- पचे भोज्य पदार्थ से ऊर्जा प्राप्त करने की क्रिया को स्वांगीकरण कहते हैं।

5. मल-परित्याग (Defaction) :- पाचन के बाद बचे हुए अवशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने की क्रिया मल - परित्याग कहलाती है।
        
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