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मौर्या वंश (Maurya vansh)(321BC- 180 BC)

मौर्य वंश

मौर्य वंश के बारे में जानकारी के कई स्त्रोत हैं

(i) पुरातात्विक स्त्रोत- जूनागढ़ अभिलेख, साहगौर अभिलेख ।

(ii) विदेशी यात्री का विवरण-इण्डिका, (मेगस्थनीज), आस्टिन, ओर जस्टिन।
(iii) साहित्यिक स्त्रोत- अर्थ शास्त्र, राजतरंगिणी, मुद्रा-राक्षस, जैन तथा बौद्ध ग्रन्थ । 
मौर्य वंश के संस्थापक चंद्रगुप्त मौर्य थे। इनकी माता का नाम मोरा था। ये निम्न जाती (आज के कुशवहा  जाति) के थे।  इनकी शिक्षा तक्षशिला में हुई थी। 
विशाखदत्त की पुस्तक मुद्राराक्षक में नंद वंश के पतन तथा मौर्य वंश के उदय की चर्चा है।

इनके अनुसार चाणक्य के सहयोग से चन्द्रगुप्त मौर्य ने घनानन्द का अंत कर दिया और घनानंद की पुत्री दुर्धरा से विवाह कर लिया।

जब चन्द्रगुप्त मौर्य मगध का शासक था। तब यूनानी आक्रमणकारी सेलयुकस निकेटर ने आक्रमण कर दिया, किन्तु चन्द्रगुप्त मौर्य ने उसे पराजित कर दिया और उसकी बेटी कॉर्नेलिया (हेलेना) से विवाह कर लिया और दहेज में एरिया आराकोसिया, जेड्रोसिया तथा पेरिस, पेमियाई, कणधार, मकराना, तथा हेरात ले लिया।

चन्द्रगुप्त मौर्य ने भी सेल्युकस निकेटर को 500 हाथी उपहार में दिए थे।

܀ सेल्युकस निकेटर ने अपना एक राजदूत मेगस्थनीज को चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में भेजा।

मेगस्थनीज की पुस्तक इण्डिका से मौर्य वंश की जानकारी मिलती है। इण्डिका में लिखा है कि मौर्य काल में समाज 7 भागों में बंटा था तथा भारतीयों को लिखने में रूची नहीं थी।

चन्द्रगुप्त मौर्य ने बंगाल अभियान भी किया था, जिसकी जानकारी महास्थान, अभिलेख से मिलती है।

܀ गोरखपुर में स्थित साहगौर ताम्र अभिलेख से अकाल के दौरान चन्द्रगुप्त मौर्य द्वारा किए गए राहत कार्यों की चर्चा है। चन्द्रगुप्त मौर्य को जैन धर्म की शिक्षा भद्रबाहु के नेतृत्व से मिली थी। भद्रबाहु के साथ ही चन्द्रगुप्त मौर्य कर्नाटक के
श्रवण बेलगोला में चला गया। जहाँ 298 BC संलेखना (संथारा) विधि से प्राण त्याग दिया। 
रूद्रदामन के जूनागढ़ अभिलेख (गुजरात) से यह जानकारी मिलती है, कि चन्द्रगुप्त मौर्य ने सरकारी खर्च से गुजरात सौराष्ट्र में सुदर्शन झील बनवायी थी।

* इस अभिलेख से चन्द्रगुप्त मौर्य के पश्चिमी विस्तार की जानकारी मिलती है।
* मौर्य वंश के बारे में सर्वाधिक जानकारी चाणक्य की पुस्तक अर्थशास्त्र से मिलती है। जो एक राजनैतिक पुस्तक है इस पुस्तक के 15 अधिकरण (Lesson) है। इस पुस्तक में राजा के राजत्व सिद्धान्त की चर्चा है, और कहा गया है कि एक मजबूत राजा को सप्रांग सिद्धान्त पालन करना होगा।

अर्थशास्त्र का संस्करण समाजशास्त्र ने किया था

जो निम्नलिखित हैं---
(i) राजा (स्वामी)।        (ii) मंत्री (अमात्य)

 (iii) जनपद ( क्षेत्र)।     (iv) दुर्ग (कीला)

(v) कोश (धन)            (vi) दंड (न्याय)    

 (vii) मित्र ।

܀ चाणक्य को विष्णुगुप्त या कौटिल्य भी कहते हैं। ये तक्षशिला के ब्राह्मण थे और तक्षशिला विश्वविद्यालय के आचार्य थे। इनके पिता का नाम गुणी था
 ܀ चाणक्य की बेइज्जती घनानन्द ने की थी। इसी के प्रतिशोध के लिए इन्होंने चन्द्रगुप्त मौर्य का सहारा लिया और घनानन्द का अंत कर दिया।

प्लूटार्क ने चन्दगुप्त मौर्य के लिए सेण्ड्रेकोरस शब्द का प्रयोग किया है।

जस्टिन ने चन्द्रगुप्त मौर्य के लिए सेण्ड्रेकोटस शब्द का प्रयोग किया है।

Willian Jones ने यह पहचान कराया कि सेण्ड्रेकाट्स ही चन्द्रगुप्त मौर्य हैं।

"बिन्दुसार"

*इसकी माता दूरधरा थी। यह चन्द्रगुप्त मौर्य का उत्तराधि कारी था

इसके दरबार में सीरिया के नरेश एटियोकस ने अपना राजदूत डायमेक्स को भेजा।

इसे मेगस्थनीज का उत्तराधिकारी माना जाता है। बिन्दुसार ने सीरिया के नरेश से अंजीर मीठा, शराब तथा दार्शनिक मांगा था।

वहाँ के राजा ने अंजीर तथा मीठी शराब दिया किन्तु दार्शनिक ने लेने से मना कर दिया क्योंकि सीरिया में दार्शनिक का व्यापार नहीं होता है।
बिन्दुसार के दरबार में मिस्र के राजा फिलाडेल्फ ने अपना
राजदूत डायनोसियास को भेजा।
बिन्दुसार के समय तक्षशिला (कश्मीर) में दो बार विद्रोह हुए। 
܀उस समय तक्षशिला का राजकुमार बिन्दुसार का बड़ा बेटा सुशीम था, जो इस विद्रोह को दबाने में असफल रहा। बिन्दुसार ने अपने छोटे पुत्र अशोक, जो इस समय अवन्ति का राजपाल था, उसे विद्रोह दबाने के लिए तक्षशिला  भेजा। अशोक ने क्रूरता पूर्वक विद्रोह को दबा दिया।

कल्हण की पुस्तक राजतरंगिनी से यह जानकारी मिलती है कि अशोक ने श्रीनगर की स्थापना की थी।

बिन्दुसार आजीवक संप्रदाय को मानने वाला था। 
बिन्दुसार की मृत्यु के बाद अशोक मगध के सिंहासन पर बैठा ।
 ܀बिन्दुसार को अमित्रघात भी कहते हैं।

"अशोक"

इसका जन्म 304 ई.पू. में हुआ (पाटलीपुत्र में)।
बौद्ध ग्रन्थों के अनुसार अशोक ने राजा बनने के लिए अपने 99 भाइयों की हत्या कर दी थी। ܀
269ई.पू. में अशोक ने अपना राज्याभिषेक कराया।
राज्याभिषेक के 8 वें वर्ष अर्थात् 261 ई.पू. में अशोक ने
कलिंग पर आक्रमण किया।

कलिंग आक्रमण की जानकारी खारबेल के हाथीगुफा अभिलेख से मिलती है।

܀ इस अभिलेख के अनुसार कलिंग आक्रमण के समय कलिंग का राजा नंद राज था। 

܀ कलिंग में हुए भीषण नरसंहार को देखकर अशोक का हृदय परिवर्तित हो गया। 
ऐसा माना जाता है कि अशोक ने हाथियों को प्राप्त करने के लिए कलिंग आक्रमण किया था।

कलिंग आक्रमण के बाद अशोक ने बौद्ध धर्म अपना लिया। इसे बौद्ध धर्म अपनाने की प्रेरणा इसके भतीजे निग्रोथ से मिली जबकि बौद्ध धर्म की शिक्षा उपगुप्त ने दी थी।

अशोक का बौद्ध धर्म उसका व्यक्तिगत धर्म था। उसने कभी भी बौद्ध धर्म को राजकीय धर्म घोषित नहीं किया। किन्तु अशोक बौद्ध धर्म को संरक्षण देता था। अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए अपने बेटे महेन्द्र एवं बेटी संघानित्रा को श्रीलंका भेजा।

श्रीलंका के राजा ने सिंघली संप्रदाय को छोड़कर बौद्ध धर्म अपना लिया। अशोक धार्मिक रूप से सहिष्णु था। अर्थात् वह किसी भी धर्म के साथ भेद-भाव नहीं करता था।

अशोक ने आजीवक संप्रदाय के लोगों को गया में स्थित बराबर की पहाड़ियों में 4 गुफा- (i) सुदामा, (ii) कर्ण, (iii) चोपड़ा, (iv) विश्व झोपड़ी दान में दे दी।

अशोक की 5 पत्नियाँ थी, जिसमें अशोक पर सर्वाधिक
प्रभाव कारूवाकी का था।
अशोक भारत का पहला ऐसा शासक था, जिसने अपने
संदेशों को अभिलेख के माध्यम से जनता तक पहुंचाया।

܀ अशोक को अभिलेख लिखने की प्रेरणा ईराक के राजा डेरियस (दारा) या दायबाहु से मिली। 
अशोक के अभिलेखों की भाषा प्रकृति थी, जिसे 4 लिपियों में लिखा गया था

(i) ब्राह्मी लिपी-यह भारत में मिले हैं।

(ii) खरोष्टि लिपी-यह पाकिस्तान से मिले हैं। 
 (iii) अरमाईक लिपी- यह अफगानिस्तान से मिली हैं। (iv) ग्रीक लिपी - यह अफगानिस्तान के उत्तरी सीमा से मिली हैं। अशोक के अभिलेख को पढ़ने की पहली सफलता 1837 ई० में जेम्स प्रिंसेप को मिली। अशोक ने अपने अधिकतर अभिलेखों में अपना नाम देवनाम प्रियदर्शी (देवताओं का पसंद) लिखा है।

मध्य प्रदेश के गुर्जर और कर्नाटक के मस्की, नेदार और
उदेगोलान अभिलेखों में अशोक का स्पष्ट नाम अशोक
लिखा हुआ है।
भाब्रू अभिलेख - राजस्थान के भाब्रू खुद को मगध का सम्राट बताया अभिलेख में अशोक ने खुद को सम्राट बताया है।
܀ भाब्रू अभिलेख में इसने बौद्ध धर्म के त्रिरत्न बुद्ध धम्म और सम्भू की चर्चा है।

अशोक के लघु अभिलेख

अशोक के 7 लघु अभिलेख मिले हैं

(1) रूमनदेई अभिलेख-यह अफगानिस्तान के कांधार से मिलता है। जो आरमाईक लिपी में है। यह सबसे छोटा अभिलेख है। यह एक मात्र अभिलेख है जिसमें अशोक ने प्रशासनिक चर्चा न करके आर्थिक क्रिया कलाप की चर्चा की है। 
(2) कौशाम्बिक अभिलेख- (UP) इसमें अशोक ने अपनी पत्नि कारूवाकी द्वारा दिए गए दान की चर्चा की है। अतः इसे रानी का अभिलेख कहते हैं। अकबर ने इसे इलाहबाद स्थापित कर दिया।

(3) टोपरा अभिलेख (हरियाणा) - फिरोजशाह तुगलक ने इसे दिल्ली के तुगलकाबाद में स्थापित करा दिया।
 (4) मेरठ अभिलेख- (UP) : फिरोजशाह तुगलक ने इसे दिल्ली के तुगलकाबाद में स्थापित करा दिया। 
(5) रामपूर्वा अभिलेख - यह बिहार के चंपारण में है।
(6) लौरिया नंदन गढ़- यह बिहार के चंपारण में है।
 ( 7 ) लौरिया अरेराज-यह बिहार के चंपारण में है।
Study 24 hr

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