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अशोक के अभिलेख, धम्म यात्रा, मौर्यकालीन आर्थिक , सैन्य , वास्तुकला तथा जीवन । मौर्य वंश के पतन के कारण

अशोक के चतुर्दश अभिलेख

(1) प्रथम शिलालेख- इसमें अहिंसा पर बल दिया गया और पशुबली पर रोक लगाया गया है।
 ( 2 ) द्वितीय शिलालेख - इसमें पशु चिकित्सा की चर्चा है साथ ही दक्षिण भारतीय राज्य जैसे- चेर, पाण्डय, श्रीलका, केरलपुत्र, सतीयपुत्र की चर्चा है, किन्तु चोल वंश की चर्चा नहीं है।
 (3) तृतीय शिलालेख- इसमें अशोक ने 3 अधिकार राजुक, युक्तक तथा प्रदेशक का चर्चा किया है। जो धम्म के प्रचार के लिए थे।

(4) चतुर्थ शिलालेख- इसमें भैरिघोष (युद्ध) के स्थान म्मघोष (बौद्ध) के नीति का चर्चा है।

(5) 5 वाँ शिलालेख- इसमें धम्म महामात्र नामक अधिकारी की चर्चा है, जो धार्मिक जीवन की देख-रेख करता है।

(6) 6 वाँ शिलालेख-इसमें अशोक ने कहा है कि मेरा अधिकारी जनकल्याण के लिए जब चाहे मुझसे मिल सकते हैं।
( 7 ) 7 वाँ शिलालेख - इसमें अशोक ने विभिन्न धर्मों के आपसी समन्वय की बात कही है। यह सबसे बड़ा शिलालेख है।
 (8) 8 वाँ शिलालेख - इसमें अशोक के धम्म यात्रा की चर्चा है, जो इसके राज्याभिषक से 8 वें वर्ष से प्रारम्भ होती है।

राज्याभिषेक के 10 वें वर्ष - गया
राज्याभिषेक के 20 वें वर्ष लुम्बनी। 

( 9 ) 9 वाँ अभिलेख- इसमें अशोक ने छोटे-मोटे त्योहारों पर प्रतिबंध लगा दिया।

(10) 10 वाँ अभिलेख- इसमें धम्म के महत्व के बारे में (11) 11 वा अभिलेख - अशोक ने कहा है कि मेरे अधिकारी ब्राह्माणों को न सताएं।
 (12) 12 वाँ अभिलेख-इसमें स्त्रियों के स्थिति में सुधार के लिए स्त्रिमहामात्रा नामक अधिकारी की चर्चा है। 
(13) 13 वाँ अभिलेख- इसमें कलिंग युद्ध की चर्चा है।

(14) 14 वाँ अभिलेख-अशोक ने कहा है, कि मैंने ऊपर लिखे गए शिलालेख के अतिरिक्त बहुत से काम किए हैं, जो इसमें नहीं लिख गए हैं। इसके लिए लिखने वाला जिम्मेदार है, मैं नहीं ।

सर-ए कुना अभिलेख- यह अफगानिस्तान के कांधार से
मिला है। जो ग्रीक तथा अरमाईक भाषा में है।

कलिंग अभिलेख में अशोक ने कहा है, कि संसार के सभी मानव मेरी संतान (पुत्र) हैं। मैं एक माँ की भांति उसके सांसारिक तथा प्रलौकिक जीवन की कामना करता हूँ। अशोक ने कहा है कि जिस प्रकार एक माँ अपने बच्चे को योगधाम को देकर निश्चित हो जती है। उसी प्रकार मैं भी
समाज की देख-रेख के लिए राजूक को नियुक्त किया है। राजूक अच्छे व्यक्ति को पुरस्कृत कर सकते हैं। और गलत व्यक्ति को दंडित कर सकते हैं।

अशोक को अभिलेख लिखने के लिए पत्थर (उत्तरप्रदेश) के चुनार से मिले हैं
अशोक की धम्म यात्रा

* अशोक ने लोगों को नैतिकता सिखाने के लिए जो नियम कानून की संहिता बनाई उसे ही धम्म कहते हैं। अशोक का धम्म स्वनियंत्रण पर आधारित था ।
* अशोक ने कहा है कि व्यक्ति अपने माता-पिता की आज्ञा
मानें। व्यक्ति ब्राह्मण तथा भिक्षूक का आदर करें । 
व्यक्ति-दास तथा सेवकों के प्रति उदार रहे। 
܀ व्यक्ति को जिओ-और-जिने-दो का पालन करना चाहिए।

 मौर्यकालिन आर्थिक व्यवस्था

इस समय अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि, पशुपालन तथा कारखाने थे। और शिक्षा का सबसे बड़ा केन्द्र तक्षशिला था। सरकारी भूमि को सीता भूमि कहा जाता था।

 मौर्यकालीन संगठन
(१) श्रेणी_ यह शिल्कारो का संगठन था। 
(ii) निगम - यह व्यापारियों का संगठन था।
 (iii) सार्थवाह - यह कारवां (काफिला) का संगठन था।

 मौर्यकालीन सैन्य व्यवस्था

मौर्य कालीन सैन्य व्यवस्था बहुत ही विशाल थी। इस समय स्थायी तथा अस्थायी दो प्रकार के सैनिक रहते थे।

मौर्यकाल की सेना नन्दों से 3 गुनी थी।

܀ जस्टिन ने कहा है, कि मौर्य की सैना डाकूओं का एक गिरोह था।

प्रशासनिक व्यवस्था

܀ मौर्यकालीन प्रशासन एक केन्द्रीकृत शासन था। राजा को

सलाह देने के लिए मंत्री परिषद् होते थे। उच्च अधिकारियों को तीर्थ या माहामात्रा कहा जाता था। इनकी संख्या 18 थी।

प्रशासनिक अधिकारियों को अध्यक्ष कहा जाता था। इनकी संख्या 26 थी।

(1) सिताध्यक्ष- कृषि विभाग

(2) अकाराध्यक्ष खनन विभाग (3) लक्ष्मणाध्यक्ष - मुद्रा विभाग

(4) राक्षिन पुलिस विभाग

(5) धर्मस्थली दिवानी न्यायालय (धन)

(6) कन्टक शौद्ध – फौजदारी न्यायालय (अपराध)

 (7) गुढ़ पुरुष गुप्तचर

(8) संस्था - स्थाई गुप्तचर (9) संचार चलायमान गुप्तचर

(10) आंटविक- जंगल का अधिकारी

(11) समाहारता _ Tax या कर

(12) शानिधाता - कोषाध्यक्ष

मौर्यकालीन वास्तुकला

मौर्यकाल में लकड़ी के भवन हुआ करते थे, जो वर्तमान पटना के कुम्हर से मिले । मौर्यकाल में पत्थर के कुशल
कारीगर होते थे |

܀ अशोक ने मध्य प्रदेश में साँची का स्तूप बनवाया है। जो सबसे बड़ा स्तूप है।

अशोक ने (UP) के सारनाथ में अशोक स्तंभ बनवाया। जिस पर 4 पत्थर के शेरों को एक ही जगह रखा। जो
अंहिसा का सूचक हैं। यही भारत का राष्ट्रीय चिन्ह भी है।

* मौर्यकाल में पत्थर की बनी सबसे महत्वपूर्ण कलाकृति पटना के दीदार गंज से मिला यह एवं यक्षिणी की मूर्ति है। अशोक के अभिलेख विभिन्न क्षेत्रों से मिले हैं, किन्तु पाटलीपुत्र से एक भी अभिलेख नहीं मिला है।

सामाजिक जीवन

अशोक ने बौद्ध धर्म को अपना लिया किन्तु यह दूसरे धर्मो का भी आदर करता था । हिन्दु धर्म त्यागने के बाद भी अशोक ने अपने नाम में देवनाम प्रियदर्शी जोड़ा, जो संस्कृत
भाषा का है। अशोक ने 11 वें शिलालेख में आदेश दिया है, कि ब्राह्मणों को कोई नहीं सताए।

܀ अशोक ने आजीवक संप्रदाय के भक्तों को गया कि 4 गुफा दे दिया।

अशोक ने पशुबली पर पूर्णतः प्रतिबंध लगा दिया। यज्ञ तथा कर्मकांड पर रोक लगा दिया जिस कारण ब्राह्मणों की आय
में बहुत कमी आ गई।

प्रशासनिक ढाँचा

मौर्यकाल में सबसे बड़ा पद राजा का होता था, उसके नीचे
युवराज होते थे।

प्रांत का शासन प्रांतपति के पास था।
*विष (जिला), विषपति के नियंत्रण में रहताथा।

*  प्रशासन की सबसे छोटी इकाई गाँव हुआ करती थी। जो
 10 गांवों का छोटा मालिक या गोप होता था। जो सबसे
ग्रामिक (मुखिया) के नियंत्रण में रहती थी। 
मौर्यकाल में प्रांतों की संख्या 4 थी, लेकिन अशोक के समय 5 हो गई, जो निम्नलिखित हैं •

प्रातं.                                          राजधानी

(1) उत्तरापथ.         -                तक्षशिला (पाकिस्तान)

(2) दक्षिणापथ.            -           स्वर्णगिरी (महाराष्ट्र)        


(3) अवन्ति.     -                      उज्जेनी (मध्य-प्रदेश

(4) प्राचि (मध्य प्रदेश) -.        पाटलीपुत्र

(5) कलिंग.-                          तोशली


Note: श्रीलंका के राजा अशोक के उपदेशों का पालन करते थे, किन्तु श्रीलंका अशोक के अधिन नहीं था।

232  ई.पू. (BC) पाटलीपुत्र में अशोक की मृत्यु हो गई। इसके बाद मगध की गद्दी पर अशोक का पुत्र कुणाल
बैठा । 
अशोक का कोई भी उतराधिकारी योग्य नहीं था। मौर्य वंश का अंतिम शासक वृहदरथ था। जो एक कमजोर तथा
आयोग्य शासक था।

इसके शासन काल में कलिंग नरेश खारवेल ने कलिंग को
मगध से स्वतंत्र कर लिया।
वृहदरथ का सेनापति पुष्यमित्र शुंग था जिसने सेना के निरीक्षण के दौरान वृहदरथ की हत्या कर दी और मौर्य वंश के स्थान पर शुंग वंश की स्थापना कर दी।

मौर्य वंश के पतन के कारण

अशोक का युद्ध नीति त्याग देना ।

अशोक का बौद्ध धर्म के प्रति अत्यधिक झुकाव , होना।
* अशोक ने बौद्ध भिक्षुकों को इतना दान दिया कि आर्थिक संकट उत्पन्न हो गया।

पतन का सबसे बड़ा कारण अशोक के उतराधिकारियों का अयोग्य होना था। साथ ही विभिन्न अधिकारी भ्रष्टाचार में लिप्त हो गए।

Note: मौर्य काल में वर्ष की शुरूआत आषाढ़ (जुलाई) महिने से होती थी ।



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