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शेरशाह सूरी (shershah Suri)

शेरशाह सूरी (1540-1545)



🔹 शेरशाह सूरी का बचपन का नाम फरीद खान था। इसके पिता का नाम  हसन अली खां  था। जो जौनपुर राज्य के अंर्तगत सासाराम के जमींदार थे ।और बहलोल लोदी के दरबार में कार्यरत थे।

🔹हसन अली के मृत्यु के बाद शेरशाह सूरी बिहार के लोहनी शासकों के दरबार में काम करने लगा।

🔹 फरीद खान ने एक शेर को तलवार की एक ही बार मे मार दिया था उसकी इस बहादुर से प्रसन्न होकर बिहार का अफगान शासक सुल्तान महमूद बहार अली लोहनी ने ही फरीद को शेरशाह सूरी की उपाधि दिया।

🔹शेरशाह सूरी द्वितीय अफगान वंश का संस्थापक कहा जाता है।

🔹शेरशाह सूरी ने जिस वंश की स्थापना किया उसे सूर वंश कहते हैं। सूर वंश की जानकारी अब्बास खान शेखानी की रचना तौफा-ए-अकबरशाही से मिलती है।

🔹शेरशाह सूरी को मध्यकाल में एक प्रबल प्रशासक के रूप में देखा जाता है। 
🔹1538 के बंगाल अभियान के बाद हुमायूं जब लौट रहा था तो 1539 में चौसा नामक स्थान पर शेरशाह ने आक्रमण कर दिया और हुमायुं को पराजित किया। 1540 के विलग्राम (कन्नौज) के युद्ध में हुमायुं को भारत छोड़ने के लिए विवस कर दिया और 1540 में दिल्ली का शासक बन गया। 
🔹शेरशाह ने हजरत-ए-आला की उपाधि धारण किया।

🔹1541 ई. में शेरशाह का गक्खर जाति के लोगों से युद्ध हुआ, जिसमें शेरशाह उनकी शक्ति को खत्म तो न कर सका पर उनकी रोकथाम के लिए उसने पश्चिमोत्तर सीमा पर रोहतासगढ़ के किले , किला-ए-कुहनका(दिल्ली) निर्माण करवाया। गक्खर लोग अपनी वीरता एवं साहस हेतु प्रसिद्ध थे एवं लूटपाट करते थे।
🔹शेरशाह ने 1542 ई. में मालवा पर आक्रमण कर उस पर अधिकार कर लिया।

🔹1543 ई. में शेरशाह ने रायसीन पर आक्रमण किया। माना जाता है कि शेरशाह ने इस अभियान में धोखे से राजपूत शासक पूरनमल को मार डाला। पूरनमाल की मृत्यु के बाद राजपूत स्त्रियों ने जौहर कर लिया। रायसीन की यह घटना शेरशाह के चरित्र पर एक कलंक माना जाता है।

🔹1544 ई. में शेरशाह सूरी ने मेवाड़ अभियान किया और यहां के शासक मालदेव को पराजित किया। मेवाड़ विजय कठिन होने के कारण शेरशाह सूरी ने कहा कि मैं एक मुट्ठी बाजरे के लिए पूरे भारत को खो चुका था।
🔹 1545 ई. में शेरशाह सूरी ने कलिंजर अभियान किया। यह अभियान एक दासी (Dancer) के लिए था। जिसे राजा  ने देने से मना कर दिया था। इस अभियान के दौरान शेरशाह सूरी के सेना द्वारा छोड़े गये तोप का गोला कलिंजर की किला से टकराकर वापस शेरशाह सूरी के समीप आ गिरा। जिससे शेरशाह सूरी की मृत्यु हो गयी। कलिंजर का वर्तमान नाम महोबा है। यह MP में है। शेरशाह सूरी को सासाराम में दफनाया गया। 
🔹शेरशाह का मकबरा सासाराम में झील के बीच ऊंचे            टीले पर निर्मित किया गया है

🔹कालिंजर का शासक कीरत सिंह था
🔹इसक बेटा इस्लामशाह योग्य था किन्तु 1553 में आकस्मिक मृत्यु हो गयी।

🔹 इसके बाद फिरोजशाह शासक बना जिसे उसके मामा (मुबारिज खान) ने मरवा दिया। शेरशाह सूरी के बाद कोई भी योग्य शासक नहीं बना और इस वंश का अंतिम शासक सिकन्दर शाह सूरी था।

💠         शेरशाह सूरी का प्रशासनिक व्यवस्था

🔹शेरशाह सूरी एक प्रबल प्रशासक था इसने बहुत से सुधार किये। इन सारे सुधार को अकबर ने भी अपनाया था। इसी कारण शेरशाह सूरी को अकबर का पथ प्रदर्शक (रास्ता दिखाने वाला) या अकबर का पूरोगामी शासक कहा जाता है।
🔹 टोडरमल शेरशाह सूरी के दरबार में भी सेवा दे चुके थे।

🔹शेरशाह सूरी ने पाटलीपुत्र का नाम बदलकर पटना रखा। इसने Grand Trank (G.T.) Road को बनवाया किया। शेरशाह सूरी के समय इस सड़क को   उत्तरपथ,शाह राह-ए-आजम,सड़क-ए-आजम और बादशाही सड़क कहा जाता था। बाद में इस सड़क की मरम्मत लॉर्ड ऑकलैंड ने किया
🔹इसने किसानों से सीधा सम्पर्क स्थापित करने के लिए रेयतवाडी व्यवस्था शुरु किया। यह किसानों को रच्यात  कहकर बुलाता था।
🔹कर की चोरी न हो इसलिए उसने भुमि की नाप करवायी इस व्यवस्था को जाब्ती व्यवस्थ कहा गया।

🔹इसने पट्टा एवं कबुलियत नामक नयी व्यवस्था शुरु की। पट्टा पर कर का विवरण रहता था कितना कर लिया जाएगा और किस समय लिया जाएगा। 
🔹कबूलियत वह दस्तावेज था जिस पर किसान इस बात की सहमति देता था कि वह पट्टा में दिये गए कर को देन में सहमत है।

🔹भूमि की माप कराने के लिए जरिबान नामक कर लिया जाता था, जो किसान भूमि का माप नहीं कराता था उसे मुहाबिलाना नामक कर लिया जाता था।

🔹शेरशाह सूरी के समय जौनपुर शिक्षा का सबसे बड़ा केन्द्र था। इसे भारत का शिराज (सर का ताज) कहा जाता था।
🔹 शेरशाह सूरी ने सोने का जो सिक्का चलाया उसे असरफी या मोहरा कहा जाता है। शेरशाह सूरी ने जो चांदी का सिक्का चलाया उसे रुपया कहा गया। इसके तांबे के सिक्का को दाम कहा जाता था। इसने भूमि की जांच करने के लिए एक कानूनगो नामक अधिकारी की नियुक्ति किया। इसने दिल्ली में किला-ए-कुहना नमक मस्जिद का निर्माण कराया। इसे ही पुराना किला के नाम से जाते हैं। इतिहासकार कहते हैं कि शेरशाह सूरी के समय यदि कोई औरत आधी रात को सोना लेकर जाती है, तो कोई भी व्यक्ति उसके सोना को छूने की हिम्मत नहीं कर सकता है।

🔹यह इस बात की ओर इशारा करता है कि शेरशाह सूरी       के समय पुलिस व्यवस्था बहुत अच्छी थी।

🔹इसके कठोर न्याय तथा दण्ड व्यवस्था के कारण               अपराध बहुत कम होते थे।

🔹शरेशाह के समक्ष अमीर-गरीब मित्र, दुश्मन सभी एक         समान होते थे।


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