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भक्ति आन्दोलन ( bhakti andolan) 600-800 AD

भक्ति आन्दोलन 600-800 AD

पूर्व मध्यकाल में भक्ति आन्दोलन दक्षिण भारत में वर्ण व्यवस्था तथा छूआछुत अत्यधिक फैल गयी। यहां से भक्ति आन्दोलन का प्रारम्भ हुआ। भक्ति आन्दोलन की शुरुआत सर्वप्रथम नयनार सन्तो ने किया। इस आन्दोलन की शुरुआत करने का श्रेय अलवार सन्तों को भी जाता है।

भक्ति आन्दोलन को एक सुदृढ़-स्वरूप देने का श्रेय शंकराचार्य को जाता है।

शंकराचार्य ने अद्वैतवाद का मत दिया और कहा कि यह संसार झूठा है। ब्रह्म सत्य है। इन्होंने स्मृति सम्प्रदाय की स्थापना किया।

शंकराचार्य ने दक्षिण भारत में भक्ति आंदोलन को बौद्ध तथा जैन धर्म के प्रभाव को कम करने के लिए किया।

इन्होंने अपने विचार के प्रसार के लिए भारत के चारों दिशा में पीठ (मठ) का निर्माण कराया। ⤵️

1. उत्तर ज्योतिष पीठ (बद्रीनाथ) उत्तराखण्ड

2. दक्षिण श्रृंगेरी पीठ (मैसूर) कर्नाटक

3.पूरब गोवर्धन पीठ ( पूरी) ओडिशा
 
4. पश्चिम शारदापीठ (द्वारका) गुजरात 

12वीं सदी में शंकराचार्य के मत को कई विद्वान ने काट दिया। ⤵️

1. माधवाचार्य ने द्वैतवाद का मत दिया और ब्रह्म सम्प्रदाय की स्थापना किया।

2. निम्बाकाचार्य ने द्वैता द्वैतवाद का मत दिया और सनक सम्प्रदाय की स्थापना किया।

3. बल्लभाचार्य ने शुद्धाद्वैतवाद का मत दिया और पुष्टि सम्प्रदाय की स्थापना किया।

4. रामानुजाचार्य ने विशीष्टता द्वैतवाद का मत दिया और श्री गणेश की स्थापना किया।

प्रारम्भ में अवित आन्दोलन दक्षिण भारत तक सिमित था। भक्ति आन्दोलन को उत्तर भारत में लाने का श्रेय रामानंद को जाता है। रामानन्द ने अपना उपदेश हिन्दी में देना प्रारम्भ किया।
                    16वीं शताब्दी में भक्ति आंदोलन अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंच गई।

उत्तर भारत का भक्ति आंदोलन उच्च-नीच तथा छुआ-छूत के विरुद्ध था। उत्तर भारत का भक्ति आंदोलन दो भागों में
बंट गया।

"भक्ति आन्दोलन  भीआगे चलकर दो भागों में बट
 गए।
   १. संगुण भक्ति।        २. निर्गुण भक्ति

 संगुन भक्ति के भी दो भाग हुए।
१. राम।                      २. कृष्ण

निर्गुण भक्ति के भी दो भाग हुए
१. संत।                     २. सूफी

संगुण भक्ति-  इस भक्ति के भक्त भगवान को एक विशेष रूप देते हैं। वे भगवान की मूर्ति या चित्र बनाते हैं और उसकी पूजा करते हैं। संगुण भक्ति दो भागों में बटा रामभक्ति तथा कृष्णभक्ति।

                      (राम भक्ति)- इस शाखा के भक्त भगवान राम की आधारना करते थे। इस शाखा के सबसे प्रमुख भक्त तुलसीदास थे जिन्होंने अवधि भाषा में रामचरितमानस की स्थापना की। उनकी अन्य प्रमुख रचना कवितावली दोहावली विनयपतिका है। ये अकबर के समकालिन थे।

अकबर ने इन्हें नवरत्न में शामिल होने का प्रस्ताव दिया। लेकिन उन्होंने इस प्रस्ताव को Reject कर दिया। दक्षिण भारत में रामभक्ति को फैलाने का कार्य त्यागराज ने किया।

(कृष्ण भक्ति)  - इस शाखा के सारे भक्त भगवान कृष्ण की अराधना करते थे। कृष्ण भक्ति में सबसे प्रमुख संत विट्ठल-स्वामी इन्होंने आठ शिष्यों को शिक्षा दिया। जिन्हें संयुक्त रूप से अष्टाछाप कहा जाता है। इस अष्टाछाप में सबसे प्रमुख शिष्य सूरदास थे।

सूरदास की रचना सूर सागर प्रमुख है।
सबसे प्रमुख महिला कृष्ण भक्ति मीरा बाई की रचना है।

महाराष्ट्र के क्षेत्र में कृष्ण भक्ति को एक साथ तुकाराम इत्यादि ने फैलाया।

तुकाराम शिवाजी के समकालिन थे। गुजरात के क्षेत्र में कृष्ण भक्ति का प्रचार नरसिंह मेहता ने किया इनकी कविता "वैष्णव जन तो तेने कहिए" है। यह महात्मा गांधी का भी पसंदीदा गीत था। बंगाल बिहार तथा उडिसा के क्षेत्र भक्ति आन्दोलन का प्रचार चैतन्य महापूयू ने किया था। इन्होंने ही हरिकिर्तन प्रारम्भ किया।
* कृष्ण भक्ति में संगीत बहुत ज्यादा है। 

निर्गुण भक्ति - इस भक्ति के सन्त किसी की मूर्ति या चित्र नहीं बनाते थे। वे बिना मूर्ति के ही अराधना करते थे। निर्गुण भक्ति दो भागों में बंट गया। संत भक्ति तथा सूफि भक्ति।

              (संत भक्ति)-  संत भक्ति के अंतर्गत गुरुनानक कबीर, धन्ना, सेना रैदास जैसे संत आते हैं।








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